माओवादी हिंसा की वो खौफनाक यादें, बस ब्लास्ट के बाद टपक रही थी इंसानी चमड़ी; 37 वर्षों में 398 निर्दोष आदिवासियों ने गंवाई जान

माओवादी हिंसा की वो खौफनाक यादें, बस ब्लास्ट के बाद टपक रही थी इंसानी चमड़ी; 37 वर्षों में 398 निर्दोष आदिवासियों ने गंवाई जान
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माओवादी हिंसा की वो खौफनाक यादें, बस ब्लास्ट के बाद टपक रही थी इंसानी चमड़ी; 37 वर्षों में 398 निर्दोष आदिवासियों ने गंवाई जान

माओवादी हिंसा की वो खौफनाक यादें, बस ब्लास्ट के बाद टपक रही थी इंसानी चमड़ी; 37 वर्षों में 398 निर्दोष आदिवासियों ने गंवाई जान

भले ही आज माओवाद खत्म हो गया हो, लेकिन कुछ ऐसी घटनाएं हैं जो आजीवन लोगों के मन में माओवादी हिंसा की भयावह यादें जिंदा रखे हुए हैं। इस लड़ाई में न सिर्फ जवानों ने शहादत दी है, बल्कि सैकड़ों निर्दोष लोगों की भी जान गई है।चिंगावरम में माओवादियों ने एक यात्री बस को आईईडी ब्लास्ट कर उड़ा दिया था, जिसमें 15 निर्दोष लोगों की जान चली गई थी। कुछ यात्रियों के शरीर पिघलकर टपकने लगे थे। आज भी उस दृश्य को याद कर लोग सहम जाते हैं। जिले में 1989 में माओवादियों ने पहली घटना को अंजाम दिया था, उसके बाद से अब तक 398 लोगों की जान हिंसक घटनाओं में चली गई और 144 गंभीर रूप से घायल हो गए।दोपहर का समय था और दंतेवाड़ा की ओर से यात्री बस सुकमा की ओर आ रही थी। इस बीच कुछ जवान उस बस को रोककर सवार हो गए थे, लेकिन किसी को यह पता नहीं था कि आगे एक खतरा उनका इंतजार कर रहा है। जैसे ही बस चिंगावरम के पास पहुंची, घात लगाए बैठे माओवादियों ने आईईडी ब्लास्ट कर दिया। जोरदार धमाके के साथ ही 15 लोगों की मौत हो गई। बस में सवार 16 जवान भी शहीद हो गए और करीब 12 लोग घायल हो गए।दोपहर का समय था और दंतेवाड़ा की ओर से यात्री बस सुकमा की ओर आ रही थी। धमाके की आवाज सुनकर आसपास के ग्रामीण स्तब्ध रह गए। कुछ लोगों ने हिम्मत जुटाकर बस के पास पहुंचने की कोशिश की, लेकिन वहां चीख-पुकार का मंजर था। प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार, कई लोगों ने उनके सामने दम तोड़ दिया, जबकि कुछ के शरीर बुरी तरह क्षतिग्रस्त हो गए थे। यह दृश्य आज भी लोगों के जहन में ताजा है।माओवाद के 37 साल का इतिहास हिंसक घटनाओं से भरा हुआ है। इनमें तोंगपाल के पत्रकार नेमीचंद जैन की हत्या भी शामिल है। नेमीचंद जैन राजधानी से निकलने वाले अखबार के पत्रकार थे और गांव-गांव जाकर खबरें जुटाते थे। एक दिन लेदा के पास माओवादियों ने उनकी हत्या कर दी। वहीं कोपनपारा सिलगेर में शिक्षादूत लक्ष्मण बारसे की भी धारदार हथियार से हत्या कर दी गई। उनका कसूर सिर्फ इतना था कि वह बच्चों को शिक्षा और देशभक्ति का संदेश दे रहे थे।माओवादियों का सबसे खतरनाक हथियार आईईडी रहा है, जिससे सबसे ज्यादा नुकसान जवानों के साथ-साथ आम नागरिकों को भी हुआ है। कई निर्दोष आदिवासी रोजमर्रा के काम के लिए जंगल जाते समय आईईडी ब्लास्ट का शिकार हुए हैं। यहां तक कि छोटे बच्चे भी इसकी चपेट में आए हैं।

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